मिशन चंद्रयान-2 राह में सफलता और असफलता

इसरो द्वारा भेजे गए चंद्रयान-2 की अंतिम क्षणों की विफलता से हर किसी को धक्का लगना स्वाभाविक है। पूरा देश बेसब्री से उस पल का इंतजार कर रहा था जब विक्रम लैंडर चांद की सतह पर उतरेगा और भारत स्पेस रिसर्च के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि अपने नाम करेगा। इसलिए जैसे ही पता चला कि चांद की सतह से 2.1 किलोमीटर की दूरी पर आकर अचानक विक्रम लैंडर का संपर्क इसरो कंट्रोल रूम से टूट गया तो इस अभियान से प्रत्यक्ष रूप में या भावनात्मक स्तर पर जुड़े सारे लोगों का दिल टूट गया। लेकिन जैसा कि मौके पर मौजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रात में और फिर सुबह इसरो मुख्यालय से राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में भी रेखांकित किया, इस विफलता से निराश होने की कोई जरूरत नहीं है। यह सही है कि पिछले कुछ वर्षों में चंद्रमा से जुड़े अभियानों के साथ आर्थिक संभावनाएं भी जुड़ गई हैं- वहां पानी, खनिज संसाधनों और हीलियम जैसे ऊर्जा स्रोतों की मौजूदगी से जुड़ी चर्चा इन अभियानों में नए आयाम जोड़ रही है 



वैसे भी विज्ञान की राह में सफलता और असफलता में न तो ज्यादा अंतर होता है और न खास दूरी। कभी असफलताओं के बीच छुपी बैठी सफलता चौंका देती है तो कभी कई सफलताएं मिलकर एक बड़ी असफलता की ओर ले जाती हैं। इसलिए विज्ञान का पहला सबक यही है कि नाकामी से निकली निराशा और कामयाबी से उपजे उत्साह, दोनों को नियंत्रित रखा जाए।


जहां तक मिशन चंद्रयान-2 की बात है तो इसमें कोई शक नहीं कि यह अत्यंत महत्वाकांक्षी और कठिन मिशन था। इसरो के वैज्ञानिक. इसमें हर कदम पर कोई न कोई उपलब्धि दर्ज करते हुए आगे बढ़ रहे थे। 3850 किलोग्राम वजन की लांचिंग ही पहले कभी नहीं हो पाई थी। जीएसएलवी के जरिये यह कमाल दिखाने के बाद बिल्कुल सटीक ढंग से चांद की कक्षा में पहुंचाया गया इसका ऑर्बिटर अपना काम बखूबी से चांद की कक्षा में पहुंचाया गया इसका ऑर्बिटर अपना काम बखूबी कर रहा है।


 नाकामी के बावजूद इस मिशन से ऐसा बहुत कुछ सीखने को मिला है जो आगे के अभियानों में काम आएगा। विफलता के कारणों पर माथापच्ची होनी ही है और उनसे निकलने वाले सबक निश्चित रूप से कहीं ज्यादा उपयोगी होंगे।